Wednesday, August 12, 2020

जाना 'राहत' का

कल 11 अगस्त को फिर एक बहुत बुरी ख़बर आई। अज़ीम तरक़्क़ीपसंद शायर राहत इंदौरी कोरोनाग्रस्त थे और दिल के दौरे से कल उनके गृहनगर इंदौर के एक अस्पताल में उनका इंतक़ाल हो गया। उनकी लोकप्रियता भाषायी सीमाओं में क़ैद नहीं थी और इसका प्रमाण उस शोक की लहर में मिलता है, जो कल से सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर दिखाई दे रही है।

जनाब राहत इंदौरी साहब को पढ़ने और मीडिया पर देखने-सुनने के मौक़े तो बहुत से आए, पर रूबरू उनका क़लाम सुनने का अवसर 1986 में छतरपुर (मध्य प्रदेश) में मिला था। अगस्त, 1986 में आकाशवाणी, छतरपुर की स्थापना के दस वर्ष पूरे हुए थे और तत्कालीन कार्यक्रम प्रमुख श्री बांकेनन्दन प्रसाद सिन्हा ने 'दशक दर्पण' शीर्षक से लगातार सात दिनों तक मंचीय कार्यक्रमों के आयोजन का निर्णय किया - कवि सम्मेलन, मुशायरा, बुन्देली कवि सम्मेलन, शास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत सभायें तथा 'युववाणी' का मंचीय कार्यक्रम। मुशायरे में राहत साहब भी पधारे थे। निज़ामत उनसे ही कराने का विचार सिन्हा जी को मुशायरा शुरू होने के कुछ पहले आया। बाक़ी शोअरा होटल से कार्यक्रम स्थल पर आ चुके थे, पर राहत साहब नहीं आए थे और अब उनका शुरू से मौजूद रहना ज़रूरी था। सिन्हा जी ने मुझे भेजा कि मैं होटल से उन्हें साथ लिवा लाऊं और संचालन के लिये राज़ी भी कर लूं। ख़ैर, मैं पहुंचा तो वे अण्डों और पराठों का नाश्ता कर रहे थे। कहा, आप भी लीजिए। मैंने माफ़ी मांगी और कहा कि मुशायरा शुरू होने के पहले उन्हें वहां पहुंचना ही है, क्योंकि निज़ामत उन्हें ही करनी है। बोले, ये सब फ़ालतू काम मैं नहीं करता। किसी तरह उन्हें मनाया और वक़्त पर पहुंच कर मुशायरा शुरू भी हो गया। राहत साहब ने बेहतरीन संचालन किया, पर जब आख़िरी शायर के पहले उन्हें अपना क़लाम पेश करने की दावत दी गई, तो पहला वाक्य उन्होंने यह कहा - रेडियो वालों के लिहाज़ में अब तक मैं यह दोयम दर्ज़े का काम कर रहा था, अब कुछ देर अपनी पसंद का असली काम करूंगा। और फिर, जैसा कहते हैं, उन्होंने मुशायरा लूट लिया। उनकी शायरी बेहतरीन कथ्य और अंदाज़े-बयां की शायरी है और इसीलिये तहत में सादगी से पढ़ कर वे तरन्नुम वालों पर भारी पड़ते थे। इस स्मरण का अंत मुझे बहुत पसंद उनके उस शेर से कर रहा हूं, जो पहली बार मैंने छतरपुर के उसी मुशायरे में सुना था।

"कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो,
ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो।"

सच, राहत इंदौरी साहब उन तमाम घरों में बने रहेंगे, जो हमारी दुनिया को बेहतर बनाने के लिये उनकी कविता ने रचे हैं। विनम्र श्रद्धांजलि।

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