Tuesday, February 21, 2012

मीडिया के भीतर

यह सही है कि मीडिया का समकालीन परिदृश्य उस कल्पना से बिलकुल अलग है, जो इस दुनिया में आने की तैयारी के समय हम कुछ लोगों के मन में थी. 'हम कुछ लोग' भी शायद मैं भावविभोर हो कर ही ज़्यादा कह रहा हूँ, क्योंकि कई साथी जिस तरह सफल प्रमाणित हुए हैं, वह बताता है कि यथार्थ की उनकी समझ और उसके दांवपेंचों पर पकड़ की उनकी योजना तब भी सटीक ही रही होगी. पर फिर भी आदर्शवाद और मिशन आदि भाव युवा पत्रकारों के मन में कमोबेश रहते थे. आज के युवा मीडियाकर्मियों के मन में ये बिलकुल नहीं हैं, ऐसा कहना बल्कि सोचना भी बड़ा ग़लत और अन्यायपूर्ण होगा. लेकिन आज सफलता के सूत्र अपेक्षाकृत जल्दी सिद्ध कर लेने का दबाव तो है, जो स्वयं ही इस विद्या की बारीकियां सिखा देता है.

मीडिया के संसार में आने के बाद वरिष्ठों और दिग्गजों में से कई के चतुर चेहरे तो लगातार देखे हैं, जब-जब पत्रकारिता के विद्यार्थियों और युवतम साथियों से साक्षात्कार के अवसर आए हैं, आश्वस्ति भी हुई है, आशंका भी.

आने वाली दुनिया में अभी तो हम मौजूद हैं. क्या छोड़ कर जाते हैं, क्या रच कर, क्या बिगाड़ कर, यह तय होना है.

Sunday, February 19, 2012

सपनों की सनद

सपने बदलते हैं. वे भी जो हम देखना चाहते हैं और वे भी जो आँखों में खून की तरह चुभते हैं. वे भी जो जीवन का मतलब और उम्मीद थे. वे भी जो सब कुछ ख़त्म होने का फ़ैसला सुनाते थे. सपने जब सब कुछ संभव था. सपने जब ज़्यादातर शिकायतें बची हैं.

अपनी ज़िंदगी से कुछ ख़ास उम्मीद बची हो कि न बची हो, पर कविता से तो है. एक कविता फिर सांस लेने लगी है. शायद जीवन के उन आख़िरी मौकों में से एक, जब कवितायें दोबारा सांस ले पाती हैं. अद्भुत है कि कवितायें सपनों के बिना नहीं होतीं.

सभी दोस्तों को याद करता हूँ. मां को, पिता को, स्कूल को, विश्वविद्यालय को. नौकरी के शुरुआती सालों को.

कल सनद तो रहेगी.

Tuesday, February 14, 2012

अलखनंदन के बिना दुनिया

इधर कई दिनों से बेहद दौड़-भाग चल रही थी. रविवार का पूरा दिन एक सम्मेलन में भागीदारी में गया था और फिर उसके बाद के डिनर से निबट कर कुछ देर रात ही घर आना हुआ था. सोमवार की सुबह एक अजीब सपना देख रहा था कि बहुत दिनों के बाद पापाजी और फिर मां से फ़ोन पर बात कर रहा हूँ और रोने लगता हूँ और सपने में ही याद आ गया कि अब तो न मां हैं न पापाजी. इस सब पर लगभग superimpose होता हुआ पत्नी का स्वर आया - "अखबार में छपा है कि अलखनंदन का देहांत हो गया."

दु:स्वप्न जारी है.

स्मृतियों में आपाधापी मची है. साल था 1979. एक भीषण निजी आघात से जूझता मैं जबलपुर में ज्ञानरंजन के पास जा पहुंचा था. उनके कहने पर हरिशंकर परसाई के घर आयोजित एक गोष्ठी में गया था. गोष्ठी के बाद भी ज्ञानजी के पास ही बैठा था कि उन्होंने कहा - "ज़रा अपने हमउम्र लोगों के साथ मिलना-जुलना कीजिए." वहां मौजूद हमउम्रों के साथ परिचय हुआ. ये थे अजित हर्षे और अशोक शुक्ल. इनके साथ टंगे-टंगे मैं जबलपुर के तब के एक जनप्रिय अड्डे श्याम टाकीज़ पर पहुंचा. अजित ने अशोक से कहा - "अभी अलख आने वाला है. आज उसे छोड़ना नहीं है. उसके नाटक की सफलता को celebrate करना है और उससे दोसा खाना है. मैंने अपने आप को कुछ अवांछित महसूस करते हुए कहा कि मैं चलता हूँ. पर मुझे रोका गया और मैं रुक गया. अलखनंदन का आगमन हुआ. थोड़ा दोहरा शरीर. गोल और अक्सर गुस्सैल चेहरा जिस पर विद्रूप भरी हंसी भी ख़ूब फ़बती थी. बैठी हुई सी पर ख़ासी तनी और खड़ी हुई आवाज़, जिससे गालियों और फ़ब्तियों के फूल भी लगातार झड़ते थे और कभी-कभी बेहद कोमल कवितायें भी. बढ़े  हुए बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी से मुझे विशेष अपनापन लगा क्योंकि मेरी अपनी भी तब यही धजा होती थी. कुछ धौलमस्ती और खींचतान के बाद हम करमचंद चौक वाले इंडियन काफ़ी हाउस में थे और दोसे का इनाम मेरे हिस्से में भी आया था.

उसके बाद. उसके बाद? एक ऐसा दोस्त बना जिसने ज़िंदगी को जैसे झकझोर के रख दिया. तब विवेचना की ओर से होने वाले अगले नाटक 'इकतारे की आँख' का rehearsal चल रहा था. हर शाम वहां जाना, उसका हिस्सा बनना और ख़ुद को खोना-पाना. ढेर सारी बातें और लम्बी कड़वी बहसें. दोस्त के भीतर जो कुछ उसे कमज़ोर लगता था, उस पर वह लगभग निर्मम प्रहार करता था. अलख की दोस्ती में एक धक्कामुक्की हमेशा शामिल रहती थी. चौंकाना, चुनौती देना और आगे-आगे धकेलना. और इसके साथ ही वह आपके लिए उस तरह बेचैन भी रहता था जैसे पिता अपने बच्चे के लिये. और इस सबके बीच इस रूखे से लगने वाले आदमी की अद्भुत सृजनात्मकता और सरोकारों को देखना और बहुधा चमत्कृत रह जाना. उससे खूब लड़ना, झींकना, कोसना और साथ ही उसके व्यक्तित्व की तेजस्विता पर जैसे मंत्रमुग्ध रह जाना. 

यह बात अभी चलेगी. हम उसके पुराने साथी और मित्र तो अवाक और स्तब्ध हैं. इतना जीवित आदमी गया कहाँ?

अपनी ही एक कविता की पंक्तियाँ याद आ रही हैं: -

"जो नहीं मरे ऐन सामने
कभी नहीं लगते
पूरी तरह मरे हुए"

Saturday, February 4, 2012

एक टुकड़ा रोशनी का

अपनी एक छोटी सी कविता यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ -

वह कहीं से
एक टुकड़ा रोशनी का
ढूंढ लाया
और उसको आंज कर
आँखें उठाईं
सात पर्दे
बात ही की बात में
ग़ायब हुए सब
धूप की
फुलवारियों की
बात फिर सोची गई है.

Monday, January 2, 2012

नववर्ष-२०१२

आगत का स्वागत, व्यतीत को विदा, इच्छाओं-स्वप्नों की फिर नयी कथा.
नववर्ष-२०१२ हेतु हार्दिक शुभकामनायें.

जो ऊपर लिखा है, उसे मैंने आज दिन में यानी १ जनवरी, २०१२ के दिन में मित्रों को एस.एम.एस. शुभकामनायें भेजने के लिए सोचा था और कुछ को भेजा भी पर मेहरबानी मोबाइल प्रणाली की आंतरिक समस्याओं या विधान की कि एक भी गया नहीं. खीझ और उम्मीद के बीच कुछ और जुड़ा और अब तक इतना हुआ है: -

आगत का स्वागत, व्यतीत को विदा, इच्छाओं-स्वप्नों की फिर नयी कथा.

हंसमुख अंधियारों से दोस्ती खिली;
दुनिया अपनी धुन की राह पर चली.
फूलों की पहचान खो रही मगर
नदी तीर हवा लगे अब भी भली.

अभी अंत नहीं, अभी और है व्यथा.

बाकी और कुछ हो न हो, यह जान कर काफ़ी चकित, कुछ पुलकित और कुछ आशंकित भी हूँ कि छंद में कुछ लिख डालने की स्थिति पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है. चिंता यों है कि तुकबंदी से दूर रहने का इतने वर्षों का प्रयास, क्या हो जाएगा वृथा.

विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास है 'खिलेगा तो देखेंगे'. आमीन.

Friday, May 7, 2010

अनदेखी मां को देखता हूँ.

कल ६ मई की तारीख़ थी। मेरे जीवन में एक बहुत बड़ी घटना की तारीख़। और जब वह घटी थी, मैं कुछ भी जान-समझ नहीं पाया था, सकता ही नहीं था। ६ मई, १९५९ को मैंने अपनी मां को खोया था। और उस समय मेरी उम्र थी १ साल १० महीने की।

जब हरदोई में होश संभाला था, सबसे पहले अहसासों में शायद एक यह था कि आसपास के घरों में और बच्चों के पास जो एक मृदुल-स्नेहिल उपस्थिति होती है, मेरे घर में वह नहीं है। दूसरा कोई बच्चा भी नहीं था हमारे घर। मैं था और पिता थे। कुछ दिन एक पहाड़ी नौकर भी था, जो अकेले पड़ गए पिताजी ने शायद मेरी देखभाल में मदद के लिए रखा होगा।

काफ़ी बाद में जान पाया था कि मां की सवाई माधोपुर में मृत्यु प्रसव के तुरंत बाद हो गयी थी। जो छोटा भाई जन्मा था, शायद तीन महीनों बाद ही मेरी ननिहाल में दिल्ली में वह भी नहीं बचा था। पिता ने मां की मौत के बाद ही सवाई माधोपुर छोड़ दिया था और मुझे गोद में ले कर हरदोई आ गए थे, जहाँ वे सनातन धर्म इंटर कोंलेज के प्रधानाचार्य बन कर पहुंचे थे। मैंने होश में आने के बाद सवाई माधोपुर कभी नहीं देखा है अब तक। अब भी इस शब्द से एक भय सा महसूस होता है।

तो जिसे मां कहते हैं, अपने लिए उसके न होने के अहसास के साथ जीवन शुरू हुआ। पिता ही मां रहे और उसी सिलसिले में मेरे दोस्त बन गए, जैसे तब अधिकतर पिता नहीं हुआ करते थे। मेरे पिता भी अपनी उन संतानों के लिए मित्र नहीं थे, जिनके बारे में भी तब मैं कुछ नहीं जानता था।

फिर मेरे घर भी मां आईं। तब मैं छः साल का होने को था। इसकी एक अलग कहानी है और शायद फिर कभी कही जाए। पर इतना अभी तुरंत कहना बहुत ज़रूरी है कि मेरी बहुत अच्छी और प्यारी मां आईं। उन्होंने उस खालीपन को पूरी तरह अपने प्यार-दुलार से भर दिया, जो मेरे अन्दर मंडराता रहता था।

पर इसका एक असर यह भी हुआ कि अपनी मृत मां के बारे में घर से बाहर कुछ कहने-सुनने का कार्य अब नहीं हो सकता था। ख़ास तौर पर हमारे १९७० में हरदोई छोड़ कर ओबरा चले जाने के बाद, जहां किसी ने मुझे कभी बिना मां के नहीं देखा था। स्वाभाविक ही था कि मां मेरी सौतेली मां के रूप में नहीं पहचानी जाना चाहती थीं, क्योंकि इस शब्द की प्रचलित छवि जैसी वे थीं भी नहीं। मुझे भी मां की यह इच्छा सही ही जान पड़ती थी और हमेशा उसे निभाने की मैं कोशिश भी करता था।

पर समझ बढ़ने के साथ-साथ मन में कहीं यह जानने की उत्कंठा होने लगी थी कि मेरी जन्मदात्री मां आखिर कैसी थी। घर में उनके कुछ चित्र थे। कभी-कभी वे सामने आ जाते और मैं उस स्त्री की छवियों को देखता रहता, जो मुझे इस संसार को सौंप गयी थी।

जब इतना बड़ा हो गया कि अकेले दिल्ली की यात्राएं करने लगा, तो अपनी मूल ननिहाल में कभी-कभी मां के बारे में कुछ पूछना शुरू किया। नाना-नानी तब तक दुनिया छोड़ चुके थे और यह बात मौसीजी और दोनों मामाओं से ही हो सकती थी। जो कुछ उनसे समय-समय पर सुना, उससे अहसास हुआ कि मेरी कविता वृत्ति और संगीत के मोह की बुनियादी ज़िम्मेदार मेरी मां ही थी। फिर अपना एक घर-संसार बना और मैंने मां के एक पुराने चित्र को बड़ा करवा कर और फ्रेम में सजा कर अपने घर के पूजा-स्थान में स्थापित कर लिया। दूसरी मां तब थीं, पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की।

अब मेरे पास मेरी इन दोनों माताओं के चित्र ही हैं। एक से स्मृतियों का पूरा संसार सम्बद्ध है और एक के साथ कल्पनाओं का। क्या कभी वास्तव की स्मृति और कल्पना की स्मृति एक साथ देखी जा सकती है ? पर हैं वे आसपास ही.

Monday, November 23, 2009

ज्ञानरंजन का ऋण.

हर बार सोचता हूँ कि अब अंतराल इतना नहीं आने दूँगा और उसके बाद हर बार अंतराल कुछ और बढ़ जाता है। ये तो एक शरीफ़ ब्लॉगर के लक्षण नहीं हैं। यदि कोई भला व्यक्ति कभी इसमें कुछ रूचि ले ले, तो निश्चय ही वह कुछ ही दिनों में मुझे पूरे अधिकार और औचित्य के साथ कोसता हुआ तोबा कर लेगा। सो इस बार की शुरुआत सीधे-सीधे क्षमायाचना के साथ ही करनी होगी।

नए घर में आया, तो नयी झंझटें भी साथ आईं। उनमें से एक थी ढंग के इन्टरनेट connection का तुरंत उपलब्ध न हो पाना। इससे स्वाभाविक ही विलम्ब होने लगा। फिर विलम्ब ही और अधिक विलम्ब का कारण बनता गया। जैसे कुछ करने की आदत होती है, मेरे जैसे काहिल व्यक्ति के लिए उससे ज़्यादा कुछ न करने की आदत होती है। सो हुई। पर सिलसिला फिर चलाने का विचार भी कभी छूटा नहीं, सो वह भी अब हो रहा है।

कल २१ नवम्बर को ज्ञानरंजन जी का जन्मदिन था। बहुत दिनों से उनसे बातचीत नहीं हुई थी। जन्मदिन की बधाई देने के लिए फ़ोन किया। 'पहल' पत्रिका के रूप में तो फ़िलहाल अभी रुकी हुई है। उसका इन्टरनेट संस्करण आरम्भ होगा, इसकी संभावना कहीं सुनी-पढ़ी थी। इस बारे में पूछने पर ज्ञान जी ने कहा कि अभी इसमें कई कठिनाइयां महसूस हो रही हैं और बहुत निकट भविष्य में शायद यह न हो पाए। उन्हें इस ब्लॉग के बारे में बताया और उन्होंने कहा कि इसे वे देखेंगे।

फ़ोन-वार्ता के समाप्त हो जाने के बाद काफ़ी देर तक ज्ञान जी मेरे साथ और आस-पास मौजूद रहे। असंख्य स्मृतियाँ कौंधने लगीं। हिन्दी के अप्रतिम कथाकार और 'पहल' के यशस्वी सम्पादक के रूप में तो ज्ञानरंजन को लाखों लोग जानते और मानते हैं, मैं स्वयं को उन बहुत से लोगों में निस्संकोच गिन सकता हूँ, जिन्हें ज्ञान जी का व्यक्तिगत साथ और स्नेह मिला। काशीनाथ सिंह ने अपने विराट संस्मरण संसार में इस पर भी लिखा है कि कैसे जबलपुर में ज्ञान जी के साथ युवाओं का एक बड़ा दल पूरी श्रद्धा और दोस्ती के साथ एकजुट हुआ करता था। मुझे भी उस पहचान को जीने का अवसर मिला और जिन लोगों के सबसे गहरे और दूरगामी प्रभाव मेरे जीवन पर पड़े, उनमें ज्ञान जी सबसे अग्रणी और महत्वपूर्ण लोगों में हैं।

इस बारे में कहने के लिए बहुत कुछ है, कई रंगों और आयामों में। जिन दिनों मध्य प्रदेश में प्रगतिशील लेखक संघ की ऊर्जा, उमंग और प्रतिध्वनियाँ अपने चरम पर थीं, कई मित्र और साथी अक्सर यह कहते थे कि इस दौर के बारे में लिख लिया जाना चाहिए ताकि सनद रहे। नहीं कह सकता कि उस अपेक्षा पर खरा उतर पाऊंगा या नहीं, पर जैसी भी बन पाये, कुछ-कुछ कोशिश ज़रूर करूंगा। यह मेरे ख़ुद के लिए भी ज़रूरी है।

उम्मीद पे दुनिया कायम है.