Tuesday, April 30, 2013

चले हज़ार कोस

भाई अनिल हर्षे ने मुझे लगभग चमत्कृत करते हुए मेरी एक पुरानी ग़ज़ल की मुझे याद दिलाई है। वैसे मुझे तो यह कभी भूली नहीं, पर अब अनिल जी की प्रेरणा से इसे यहाँ साझा कर रहा हूँ।

उस शक्ल की तलाश में चले हज़ार कोस,
झंखाड़ ग़र्द घास में चले हज़ार कोस।

हर सुबह ज़िंदगी के इंतज़ाम में गई,
हर शाम एक लाश ले चले हज़ार कोस।

तेवर उछालने की रस्म क़ीमती सुनी,
तो तेवरों की आस में चले हज़ार कोस।

बरबादियों के सिलसिले बनते चले मग़र
ज़िंदा वही उछाह ले चले हज़ार कोस।

सूरज की रोशनी तो नहीं पा सके अभी,
तारों की धूप-छाँव में चले हज़ार कोस।


(यह सब फेसबुक पर 2 9 अप्रैल को हुआ था। आज 30 अप्रैल को इसे यहाँ भी प्रस्तुत कर रहा हूँ।)

Wednesday, March 27, 2013

रंग गाएं

रंग आएं, रंग जाएं, रंग आँखों को लुभाएँ,
रंग झूमें, रंग गाएं, रंग तन-मन में समाएं,
रंग महकें, रंग छाएँ, रंग सपनों को सजाएं,
रंग, संग, उमंग मिल कर, धूम होली की मचाएं।

सबको सभी स्नेहियों-स्वजनों के साथ होली की असीम शुभकामनायें।

Wednesday, February 20, 2013

अब तक का आख़िरी पूरा गीत

आज अपना एक पुराना गीत बांटने का मन हो आया है: -

गीत लिखना चाहता हूँ
गीत लिखना चाहता हूँ।

शब्द आँखों में अड़े हैं
जीभ पर ताले जड़े हैं
हादसे इतने हुए हैं
रास्ते गुमसुम खड़े हैं

उम्र के इस मोड़ पर फिर भी
स्वयं को साफ़ दिखना चाहता हूँ
गीत लिखना चाहता हूँ।

फूल सब गिरते गए हैं
हौसले थिरते गए हैं
डगमगाते पाँव पीछे की तरफ़
फिरते गए हैं

राह जो आगे धकेले उस हवा के
संग सिंकना चाहता हूँ
गीत लिखना चाहता हूँ।

वैसे अब अहसास हो रहा है कि पुराना सही पर अब तक का मेरा यह आख़िरी पूरा गीत है।

Friday, February 1, 2013

काफ़ी पहले की अपनी एक ग़ज़ल

काफ़ी पहले लिखी (यह बात झलकती है) अपनी इस सीधी-सादी ग़ज़ल को न जाने क्यों फिर पढ़ने और पढ़वाने का जी हो आया है: - 

उसकी आँखों का उजियारा,
हर ले गया अँधेरा सारा।

सच में पहली बार मिला है,
ज़िंदा जिस्म, धड़कता नारा।

चौखट से जब पाँव निकाले,
कुंठाओं ने किया किनारा।

गीत गाँव में गूँज उठा है,
अपनी धरती, अम्बर सारा।

Friday, October 12, 2012

70 के अमिताभ

कल 11 अक्टूबर को सारा मीडिया तथाकथित 'सदी के महानायक' श्रीमान अमिताभ बच्चन के जन्मदिन पर न्योछावर हुआ जा रहा था। हमारे समय के विचलन और स्खलन का संभवतः यह भी एक संकेत था कि इस पूरी हायतोबा में कहीं इस तथ्य का उल्लेख तक देखने को नहीं मिला कि यह लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन था, जो निश्चय ही भारत के लिये श्रीमान 'बेचन या बेचो कुमार' से कहीं ज्यादा बड़ा व्यक्तित्व है। और अमिताभ पर चर्चा में ज़ी बिज़नेस चैनेल पर एक सूची उनकी फ़्लॉप यानी असफल फ़िल्मों की गिनाई गई, जिसमें पहला नाम अमिताभ की पहली फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' का बताया गया। मतलब यह कि ख्वाज़ा अहमद अब्बास की जिस मार्मिक फ़िल्म से अमिताभ का चित्रपट सफ़र शुरू हुआ, उसका दर्ज़ा अब सिर्फ़ उनकी एक कमा न पाने वाली फ़िल्म का है। हम लोग प्रगतिशील विचारधारा में विश्वास रखते हैं और भविष्य को, नूतन को आशा और अनुराग से देखते हैं या देखना चाहते हैं। पर इस मूल्य या मूल्यांकन पद्धति से तो स्तब्ध ही हुआ जा सकता है। खैर, चलो, अमिताभ 70 के हुए पर अभी काफ़ी दिन काफ़ी कुछ बिकवाते चलेंगे और फिर उनके सुपुत्र और पुत्रवधू तो 'बेचन' परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे ही। बहरहाल, 'सात हिन्दुस्तानी', 'आनंद', 'अभिमान', 'आलाप' और उन जैसी कुछ और गिनीचुनी फिल्मों के कलाकार अमिताभ को जन्मदिन की बधाई कि उन्होंने सार्थक और बेहतर सिनेमा में बड़े योगदान की उम्मीदें तो जगाई ही थीं, पूरी नहीं हुईं तो कोई बात नहीं। और कौन जाने, भविष्य में क्या हो।

Friday, March 9, 2012

होली मुबारक़

रंगों की नींद और रंगों के सपने,
रंगों का सूरज और रंगों की किरणें,
रंगों की धूप और रंगों की छाँव,
रंगों के फूल और रंगों के गाँव.

होली बहुत-बहुत मुबारक़.

Monday, March 5, 2012

विश्व पुस्तक मेला - 2012

विश्व पुस्तक मेले में आख़िरी दो दिनों में जाना हुआ. साहित्यिक मित्रों में कहानीकार राजेन्द्र दानी मिले और रमेश उपाध्याय जी से उनके शब्द-संधान प्रकाशन के स्टाल पर ही भेंट हुई. प्रज्ञा, राकेश और संज्ञा से भी. संज्ञा की पहली किताब उसके हस्ताक्षर के साथ मिली. बहुत से साथी इस आयोजन के अन्य प्रसंगों यथा पुस्तक विमोचन-लोकार्पण आदि में भी मनोयोगपूर्वक सहभागिता करते हैं, पर मेरा मन इन सबसे अब बिलकुल उचट गया है. किताबों के बीच घूमना, उन्हें देखना, छूना, उलटना-पलटना, यथासंभव ख़रीदना - इतना अपने लिए अब काफ़ी रहता है. अकेले होने के दुःख तो जगजाहिर हैं, पर सुख भी होते हैं. और दिल्ली में तो अकेलापन एक नियामत ही है.